Wednesday, 28 September 2016

2-434 शिकस्त देने का मेरा

शिकस्त देने का मेरा  अंदाज़ निराला है,
शत्रु के दिल से मैंने पहले डर निकाला है,
बचा रक्खा है मैंने उसे ख़ास वक्त के लिए,
वर्ना तो वो मेरे लिए सिर्फ एक निवाला है..(वीरेंद्र)/2-434


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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