Sunday, 4 September 2016

2-431 चल आजा अब,

चल आजा अब, कृष्ण कन्हैया,
मेरे ये दोनों नयन हैं तरस गए,

हे कठोर देख देख कर राह तेरी 
जाने कितने युग हैं गुज़र गए,

बजती थी बंसी, नाचती थीं गैय्यन,
जाने वो दिन कहाँ हैं ,किधर गए,

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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