Wednesday, 7 September 2016

1-801 जाने क्यों लोग यकीं

जाने क्यों लोग यकीं कर लेते हैं मेरी मुस्कराहटों पर,
मेरे तो दर्द भी हैराँ हैं मेरे हँसते रहने की आदत पर..(वीरेंद्र)/1-801 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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