Tuesday, 27 September 2016

0-570 तेरी यादें भी आ-आकर

तेरी यादें भी आ-आकर थक गईं,
राह देख-देख आँख भी लग गईं,
तेरे शहर से जो चलीं थीं आँधियाँ,
जाने क्यूं मेरे पास आकर रुक गईं..(वीरेंद्र)/0-570


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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