Friday, 9 September 2016

0-569 आतीं हैं जब आंधियां,

    आतीं हैं जब आंधियां, बेहिसाब पेड़ टूट जाते हैं,
    सूखे तो सूखे, हरे-भरे दरख़्त भी टूट जाते हैं,
    वक्त के तक़ाज़ों से आज़िज रहता है इंसान,
    कुछ रिश्ते टूट जाते, तो कुछ यूँही छूट जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-569
    रचना: © वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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