Sunday, 4 September 2016

0-568 फूल फूल हैं,

फूल, फूल हैं, कींचड में खिलें या बाग़ में,
ख्वाब, ख्वाब हैं, गुदड़ी में आएं या कमख्वाब में,
खुशियाँ ज़िन्दगी से वाबस्ता नहीं होतीं,
वो तो मिला करती हैं जीने के अंदाज़ में...(वीरेंद्र)/0-568

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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