Friday, 30 September 2016

2-449 आज पूरा देश बहुत

आज पूरा देश बहुत खुश है पर गद्दारों तुम खुश नहीं होना, 
तुम्हारे आकाओं ने तो तुम्हे सिखाया है ताउम्र रोते ही रहना..(वीरेंद्र)/2-449


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-448 चंद गद्दार शाद हुए

चंद ग़द्दार शाद हुएे, जिस रोज़ हमारे जांबाज़ जवान हलाक हुए, वतनपरस्त खुश है आज, वो दहशतगर्द ज़िन्दगी से आज़ाद हुए..(वीरेंद्र)/2-448

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-443 बढती ही जा रही है

बढ़ती ही जा रही है 'नाबर्दाश्तगी' यहाँ वहां, 
अमन के फ़रिश्ते अब जाएँ भी तो जाएँ कहाँ,
मेरा मुल्क ही बचा था  एक महफूज़ जगाह,
शत्रु तुले हैं मिटाने को इसका भी नामोनिशाँ..(वीरेंद्र)/2-443


रचना:  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

Wednesday, 28 September 2016

2-427 आलोचना और टांग खिंचाई

आलोचना और टांग खिंचाई में फर्क समझना होगा
देश नेताओं का नहीं सबका है ये तथ्य समझना होगा,.(वीरेंद्र)/2-427


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-426 70 साल से पड़ी आदत

70 साल से पड़ी आदत मुश्किल से जायगी,
देश आज़ाद हो गया, गुलामी देर से जायगी..(वीरेंद्र)/2-426


रचना: वीरेंद्र सिन्हा :"अजनबी"

2-434 शिकस्त देने का मेरा

शिकस्त देने का मेरा  अंदाज़ निराला है,
शत्रु के दिल से मैंने पहले डर निकाला है,
बचा रक्खा है मैंने उसे ख़ास वक्त के लिए,
वर्ना तो वो मेरे लिए सिर्फ एक निवाला है..(वीरेंद्र)/2-434


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 27 September 2016

1-807 किस कदर हुनरमंद

किस कदर हुनरमंद हैं इस दौर के लोग,
यूं बदल जाते हैं आइना भी नहीं पहचानता..(वीरेंद्र)/1-807

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी
"

1-806 कौन कहता है वक्त

कौन कहता है वक्त, फ़क्त सितम ही करता है
हमने तो ये भी देखा है, वो करम भी करता है
..(वीरेंद्र)/1-806



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-433 'सेक्युलर' लोग सभी सवालों

'सेक्युलर' लोग सभी सवालों से मुक्त हैं,
यह लोग कभी मुस्लिम, कभी पंडित हैं।
भले ही हमारे देश में लोकतंत्र है, मगर,
ये कहते, सत्ता में बस हम ही उपयुक्त हैं..(वीरेंद्र)/2-433


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-441 हालात इतने बदतर

हालात इतने बदतर हो गए कि,
मुल्क के खिलाफ गैर-मुल्की तो कम,
मुल्क के कुछ दानिशमंद ज़्यादा बोल रहे हैं,
वतनपरस्तों का दर्द बढ़ने लगा जब,
चंद मुंतज़िरे-हुकूमत भी वही बोलने लगे जो,
दहशतगर्द अल्हेदगीपसंद रोज़ाना बोल रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-441

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

0-570 तेरी यादें भी आ-आकर

तेरी यादें भी आ-आकर थक गईं,
राह देख-देख आँख भी लग गईं,
तेरे शहर से जो चलीं थीं आँधियाँ,
जाने क्यूं मेरे पास आकर रुक गईं..(वीरेंद्र)/0-570


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 25 September 2016

2-442 "आरक्षण" जिन दलितों के

'आरक्षण' जिन दलितों के लिए था लक्षित, उसका फायदा उनको मिला नहीं, 
'नारी-सशक्तिकरण' का लाभ उनको मिला जिनके लिए वह लक्षित था नहीं।
खा चुके 'आरक्षण-मलाई' कुछ अपने गरीब दलित भाइयों के लिए छोड़ दो,
शहरों में हो गया 'सशक्तिकरण', कुछ ग्रामीण गरीब बहनों के लिए छोड़ दो।


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"/2-442

Monday, 19 September 2016

2-440 ऐसे लोगों को गले


ऐसे लोगों को गले लगाते हो क्यों,
जो खुद को सिकंदर समझते हों,
उनको इस कदर छूट देते हो क्यों,
जो खुदको तीसमारखां समझते हों।
कर दो नेस्त नाबूद ऐसे एहमकों को,
जो इंसानियत की ज़ुबाँ न समझते हों..(वीरेंद्र)/2-440

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


2-424 किसी का क्या कसूर

किसी का क्या कसूर जब लग रही हो आग घर के चरागों से,
दुश्मन से तो निपट ले कोई, कैसे निपटें घर में छिपे गद्दारों से..(वीरेंद्र)/2-423


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-423 अब तो जुबां खोलते

अब तो जुबान खोलते भी डर लगता है,
न जाने कौन इसको लम्बी करार दे दे..(वीरेंद्र)/2-423

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 17 September 2016

2-422 खुदा की मर्ज़ी के सामने

खुदा की मर्ज़ी के सामने लोग अपना सर झुका रहे हैं,
किसी को ज़ुबाँ नहीं मिलती, तो कुछ इसे कटवा रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-422 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 13 September 2016

2-432 हिंदी, तुम सही बोलीं

हिंदी, तुम सही बोलीं इस देश में गंगा है उलटी बहने लगी,
तुम पराई सी हो गईं जबसे आकर यहाँ विदेशी रहने लगी,
किन्तु तुम देश की माटी की खुशबू हो, भारत की आत्मा हो,
तुम व्यर्थ आशंका आत्महीनता सी क्यों महसूस करने लगी.


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-805 इस तन्हाई में क्यूं

इस तन्हाई में क्यूँ याद करता हूँ मैं उन अपनों को,
गैरों की भीड़ में जिन्होंने मुझे कभी पहचाना नहीं..(वीरेंद्र)/1-805


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-440 ना नगरपालिका मेरा

ना नगरपालिका मेरा अवैध कब्ज़ा ढहाती,
ना खुदको भ्रष्टाचारी या रिश्वतखोर कहाती.
मुझे कहाँ था इनकार, मै रिश्वत दे भी देता,
अगर ये सरकार मुझे अपना दामाद बनाती..(वीरेंद्र)/2-440


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-439 देखो भाई ऐसा है,


देखो भाई ऐसा है
अच्छे दिन की उसे ही है इंतज़ार,
जिसके पास पहले ही बहुत पैसा है
सबका टेक्स भरना, टेक्स चुकाना है,
मेरा टेक्स भरना चैरिटी जैसा है।
दुनिया करती है अवैध कब्ज़े,
मैंने किया तो बोले, तू ऐसा है वैसा है.(वीरेंद्र)/2-439

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-804 नजदीकियों का भी कोई

नजदीकियों का भी कोई क्या करे,
तन्हाइयां जिसकी आदत हो गईं हों..(वीरेंद्र)/1-804


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-803 मुझे आज भी याद हैं

मुझे आज भी याद हैं अपनी मुफलिसी के दिन,
हसीं थी ज़िंदगी मिल बैठके गुज़र जाते थे तंगी के दिन..(वीरेंद्र)/1-803


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-802 मै भी खुदगर्ज़ हवाओं

मै भी खुदगर्ज़ हवाओं का रुख मोड़ना चाहता हूँ
किसी बेवफा हसीं का दिल अब तोडना चाहता हूँ.(वीरेंद्र)/1-802
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी" 

Friday, 9 September 2016

2-431 बला की खूबी होती है

बला की खूबी होती है कुछ लोगों में, 
कुछ न होके भी खुदको खुदा समझते हैं,
दुनियां लाख आइना दिखाती रहे उन्हें, 

वो खुद को सुभान-अल्लाह समझते हैं..(वीरेंद्र)/2-431

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

0-569 आतीं हैं जब आंधियां,

    आतीं हैं जब आंधियां, बेहिसाब पेड़ टूट जाते हैं,
    सूखे तो सूखे, हरे-भरे दरख़्त भी टूट जाते हैं,
    वक्त के तक़ाज़ों से आज़िज रहता है इंसान,
    कुछ रिश्ते टूट जाते, तो कुछ यूँही छूट जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-569
    रचना: © वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 7 September 2016

1-801 जाने क्यों लोग यकीं

जाने क्यों लोग यकीं कर लेते हैं मेरी मुस्कराहटों पर,
मेरे तो दर्द भी हैराँ हैं मेरे हँसते रहने की आदत पर..(वीरेंद्र)/1-801 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 4 September 2016

2-421 वक्त का कोई झोंका

वक्त का कोई झोंका जिसे साथ ले उड़े,
उसे कोई झूंटे प्यार का नाम क्यों न दे...(वीरेंद्र)/2-421

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

2-431 चल आजा अब,

चल आजा अब, कृष्ण कन्हैया,
मेरे ये दोनों नयन हैं तरस गए,

हे कठोर देख देख कर राह तेरी 
जाने कितने युग हैं गुज़र गए,

बजती थी बंसी, नाचती थीं गैय्यन,
जाने वो दिन कहाँ हैं ,किधर गए,

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-568 फूल फूल हैं,

फूल, फूल हैं, कींचड में खिलें या बाग़ में,
ख्वाब, ख्वाब हैं, गुदड़ी में आएं या कमख्वाब में,
खुशियाँ ज़िन्दगी से वाबस्ता नहीं होतीं,
वो तो मिला करती हैं जीने के अंदाज़ में...(वीरेंद्र)/0-568

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"