Tuesday, 12 July 2016

1-800 ग़फ़लत में रहे हम

ग़फ़लत में रहे हम अब तलक, आँखें खुलीं मंज़रे-शमसान से,
आराम से नहीं मिलता लुफ्ते-ज़िन्दगी, मिलता है थकान  से.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


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