Tuesday, 12 July 2016

1-800 ग़फ़लत में रहे हम

ग़फ़लत में रहे हम अब तलक, आँखें खुलीं मंज़रे-शमसान से,
आराम से नहीं मिलता लुफ्ते-ज़िन्दगी, मिलता है थकान  से.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


1-799 ये पाँव बहुत खूबसूरत हैं

ये पांव बहुत खूबसूरत हैं, मगर इन्हें आसमान पर मत रखिये,
इन्हें भी ज़रुरत है ज़मीं की, इन्हें ज़मीं से महरूम मत रखिये..(वीरेंद्र)/1-799

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"