Saturday, 25 June 2016

1-797 ज़िन्दगी के दर्द यूंही ख़त्म

ज़िन्दगी के दर्द यूँहीं ख़त्म नहीं हो जाते,
बदन पर कफ़न को भी ओढ़ना पड़ता है..(वीरेंद्र)/1-797

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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