Wednesday, 8 June 2016

1-795 रात का सन्नाटा ऊपर से ये

रात का सन्नाटा, ऊपर सेे ये तन्हाई है,
शायद कोई ग़ज़ल बनने की घडी आई है..(वीरेंद्र)/1-795

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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