Wednesday, 8 June 2016

1-793 दिन ढल जता है, शाम भी

दिन ढल जाता है, शाम भी ढल जाती है,
फिरसे उम्मीदे-सहर दिल में पल जाती है..(वीरेंद्र)/1-793

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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