Wednesday, 29 June 2016

0-430 बरखा की बूँदें मुख मंडल पर

बरखा की बूँदें मुख-मंडल पर,
खेलती उमंगें मन चंचल पर,
कारे मेघा बरस कर चले गए,
हरियाली बिखरी धरातल पर..(वीरेंद्र)/0-430

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-798 समझा न सका ज़माने को,

समझा न सका ज़माने को, तो चुप हो गया,
हार गए दर्द मुझसे, मै जबसे बेखुद हो गया..(वीरेंद्र)/1-798

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 25 June 2016

1-797 ज़िन्दगी के दर्द यूंही ख़त्म

ज़िन्दगी के दर्द यूँहीं ख़त्म नहीं हो जाते,
बदन पर कफ़न को भी ओढ़ना पड़ता है..(वीरेंद्र)/1-797

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 8 June 2016

0-429 कब्रों से वापिस निकल पड़े,

कब्रों से वापिस निकल पड़े हैं,
मुर्दों में जैसे जान आ गयी,
हांकने लगे बड़ी-बड़ी बातें वो,
कि चुनाव घड़ी पास आ गई..(वीरेंद्र)/0-429

रचना : वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-428 पैंसठ साल तक गीत गा लिए

पेंसठ साल तक गीत गा लिए तुमने,
ऐ, तलुए-चाटों अब तो कान पकड़ लो,
मिट गये  वो राजसी घराने, ऐ भांडों,
अब तो कोई नया धंधा तुम पकड़ लो..(वीरेंद्र)/0-428

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-567 टर्र टर्र करने वाले यूं

टर्र टर्र करने वाले यूँ तो बरसाती ही हैं,
पर जीने का हक़ तो उन्हें भी मिला है,
टर्र टर्र करते हैं, बिगाड़ते कुछ भी नहीं,
मगर लोगों को उनसे इसमें भी गिला है..(वीरेंद्र)/0-567

रचना: वीरेंद्र सिन्हा"अजनबी"

0-566 बात बात में हमसे शेर

बात बात में हमसे शेर मारे नहीं गए,
लफ़्ज़ों में ख्यालात सँवारे नहीं गए,
पर हमने खोलकर रख दिया है दिल,
भले ही हम किसी मुशायरे नहीं गए..(वीरेंद्र)/0-566

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-565 कोई रात ऐसी आती है,

कोई रात ऐसी आती है,आँख को नींद मिलती नहीं,
कोई नींद भी ऐसी आती है, आँख कभी खुलती नहीं, 
इंसान बड़ा बे-इख्तियार सा है अपनी ही ज़िन्दगी में,
इसमें मर्ज़ी सिवा खुदा के किसी की भी चलती नहीं..(वीरेंद्र)/0-565

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-796 बुलंदी पे जाकर अपनी

बुलंदी पे जाकर अपनी चंद खूबियों पर इतना न कूदा कर,
ज़मींन पर आकर ज़रा अपनी खामियां भी देख लिया कर..(वीरेंद्र)/1-796

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-564 इधर करवट ले, चाहे उधर

इधर करवट ले, चाहे उधर करवट लेले,
थोडा सा ही जिंदगी में आराम मिलेगा,
ओढेगा जब मिटटी की चादर बदन पर,
तब ही मुस्तकिल तुझे आराम मिलेगा..(वीरेंद्र)/0-564

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-563 किसी की बद दुआ लग गयी,

किसी की बद दुआ लग गयी, 
तो किसी की नेक दुआ फल गयी,
आई तो थी मौत करीब मगर,
बद दुआ पे दुआ भारी पड़ गयी,,(वीरेंद्र)/0-563

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-795 रात का सन्नाटा ऊपर से ये

रात का सन्नाटा, ऊपर सेे ये तन्हाई है,
शायद कोई ग़ज़ल बनने की घडी आई है..(वीरेंद्र)/1-795

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-793 दिन ढल जता है, शाम भी

दिन ढल जाता है, शाम भी ढल जाती है,
फिरसे उम्मीदे-सहर दिल में पल जाती है..(वीरेंद्र)/1-793

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"