Sunday, 22 May 2016

1-790 इन खामोश लबों पर

इन खामोश लबों पर जो हल्की मुस्कराहट है,
यही तो मेरी मुन्तज़िर मुहब्बत की आहट है..(वीरेंद्र)/1-790


रचना: वीरेन्द सिन्हा "अजनबी"

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