Wednesday, 25 May 2016

0-562 इतना भी गुमा न कर

इतना भी ग़ुमाँ न कर तू बैठकर ऊंचाइयों पर,
उड़के तो ख़ाक भी बैठ जाती है ऊंचाइयों पर.
क्या हस्ती, क्या खाक, दोनों ही मिट जाती हैं,
कहाँ ठहर पाती हैं वो मुस्तकिल ऊंचाइयों पर..(वीरेंद्र)/0-562


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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