Sunday, 22 May 2016

0-561 बदन पर मेरे बहुत

बदन पर मेरे बहुत निशाँ हैं ज़ख्मों के,
अब  और न कोई ज़ख्म तू नया देना,
मैं ज़ख्म गिन कर परेशां हो जाता हूँ,
देना भी तो पुराने ज़ख्म को हवा देना..(वीरेंद्र)/0561


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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