Sunday, 22 May 2016

0-560 तुझसे-मुझसे ही है

तुझसे-मुझसे ही है मुआशरे की शक़ल,
मैं बदल रहा हूँ, मेरे साथ तू भी बदल,
इस चमन को पुरसुकूं बनाने के वास्ते,
मैं तो निकल रहा हूँ, साथ तू भी निकल..(वीरेंद्र)/0560


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment