Monday, 9 May 2016

0-555 कैफियते-गमे-दम

कैफियते-ग़मे-दिल खुल ही गई आखिर,
हमने  हरचंद कोशिश की थी छुपाने की, 
कबसे रोक रखे थे आँखों में आंसू हमने,
पर उन्हें बड़ी जल्दी थी टपक जाने की..(वीरेंद्र)/0555

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment