Wednesday, 25 May 2016

0-562 इतना भी गुमा न कर

इतना भी ग़ुमाँ न कर तू बैठकर ऊंचाइयों पर,
उड़के तो ख़ाक भी बैठ जाती है ऊंचाइयों पर.
क्या हस्ती, क्या खाक, दोनों ही मिट जाती हैं,
कहाँ ठहर पाती हैं वो मुस्तकिल ऊंचाइयों पर..(वीरेंद्र)/0-562


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 22 May 2016

1-794 इतनी तो मुहब्बत थी

इतनी तो मुहब्बत थी मेरे कातिल को मुझसे,
क़त्ल करके भी मुझको, छाँव में डाला उसने..(वीरेंद्र)/1-794


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-420 मीठा झूंट भी बोल

मीठा झूंट भी बोल लिया कर कभी-कभी,
क्यों कड़वा सच बोलके अपनों को खोता जाता है..(वीरेंद्र)/2-420


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-792 इतनी भी ख्वाहिशें

इतनी भी ख्वाहिशें पूरी न करना मेरी,
कि ये ज़िन्दगी बे-ख्वाहिश सी हो जाए..(वीरेंद्र)/1-792


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-791 अब ना रहा कोई इमकान

अब ना रहा कोई इम्कान उसके लौट कर आने का,
पर जाने कब होगा यकीं दिल को, ये मान जाने का..(वीरेंद्र)/1-791


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-790 इन खामोश लबों पर

इन खामोश लबों पर जो हल्की मुस्कराहट है,
यही तो मेरी मुन्तज़िर मुहब्बत की आहट है..(वीरेंद्र)/1-790


रचना: वीरेन्द सिन्हा "अजनबी"

0-561 बदन पर मेरे बहुत

बदन पर मेरे बहुत निशाँ हैं ज़ख्मों के,
अब  और न कोई ज़ख्म तू नया देना,
मैं ज़ख्म गिन कर परेशां हो जाता हूँ,
देना भी तो पुराने ज़ख्म को हवा देना..(वीरेंद्र)/0561


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-560 तुझसे-मुझसे ही है

तुझसे-मुझसे ही है मुआशरे की शक़ल,
मैं बदल रहा हूँ, मेरे साथ तू भी बदल,
इस चमन को पुरसुकूं बनाने के वास्ते,
मैं तो निकल रहा हूँ, साथ तू भी निकल..(वीरेंद्र)/0560


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 9 May 2016

1-788 अब न कर कोई उम्मीद

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अब न कर कोई उम्मीद, न कर आरज़ू,
अजनबी आया, अजनबी चला जा यार तू..(वीरेंद्र)/1-788


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-418 सभी कुछ तो है मेरे

सभी कुछ तो है मेरे पास, मगर कुछ भी नहीं है,
इस ज़िन्दगी में अगर माँ, तेरी मौजूदगी नहीं है,
कभी कभी दिल करता है, मैं बच्चा बन जाऊँ,
पर संभव नहीं माँ, जब दुनियां में तू ही नहीं है..(वीरेंद्र)/2-418


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-787 गुज़रे हैं हम राह से,

गुज़रे हैं हम राह से, पत्थर हटा हटा कर,
के हमारे बाद वाले की राह आसान हो..(वीरेंद्र)/1-787


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-555 कैफियते-गमे-दम

कैफियते-ग़मे-दिल खुल ही गई आखिर,
हमने  हरचंद कोशिश की थी छुपाने की, 
कबसे रोक रखे थे आँखों में आंसू हमने,
पर उन्हें बड़ी जल्दी थी टपक जाने की..(वीरेंद्र)/0555

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 5 May 2016

1-786 ऐ खुदा ये कैसा नसीब

ऐ खुदा ये कैसा नसीब हमें नसीब हुआ है,
दौरे-ऐ-तरक्की में गरीब और गरीब हुआ है..(वीरेंद्र)/1-786


रचना: .वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-554 किस का दिल रक्खे,

किस का दिल रक्खे, किस का तोड़ डाले ये बादल,
इसके घिर आने से कोई खुश है तो कोई है घायल,
किसी का टूटा आशियाना, किसी का सूखा है खेत,
प्रकृति कैसे भेदभाव करे, पूरा प्रिय है उसे धरातल..(वीरेंद्र)/0-554


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-784 मेरा दिल तोड़कर

मेरा दिल तोड़ कर वो बेरहम तो बड़े आराम से सोया होगा,
उसे क्या मालूम दिल टूटा जिसका, वो कितना रोया होगा..(वीरेंद्र)/1-784


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"