Thursday, 21 April 2016

0-552 ज़ुबान की हिफाज़त करता

ज़ुबान की हिफाज़त करता हूँ, कहीं फिसल न जाय,
दिल काबू में रखता हूँ, हाथ से कहीं निकल न जाय,
खुदा की बक्षी हुई बड़ी नेमत है ये ज़िन्दगी "वीरेंद्र",
डरता हूँ मकसद खाक में इसका कहीं मिल न जाय..(वीरेंद्र)/0-552


रचना: वीरेंद्र सिन्हा"अजनबी"

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