Tuesday, 19 April 2016

3-94 अधूरी रह जाएं गर कुछ

अधूरी रह जाएं गर कुछ हसरतें तो जीने का सबब होती हैं,
इन्तजारे-यार में मिल जाएं चंद और साँसें तो बहुत होती हैं.


हर कली की चाहत है खिलखिला कर चहकना और महकना,
मुनास्सिर है मगर इस पर कि चमन में बहारें कब होती हैं.


तमाम उम्र इंतज़ार कर लेना तो फिर भी मुमकिन है "वीरेंद्र",
वक्त-ऐ-आखिरी की घड़ियाँ मगर आमद-ऐ-ज़ुल्मत होती हैं..(वीरेंद्र)/3-94



रचना: .वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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