Wednesday, 27 April 2016

2-417 दिल के अन्दर है गुबार

दिल के अंदर है ग़ुबार, बाहर है बहार,
हम जीतके हारे, वो हारकर पहने हार,
बरसों-बरस बरसे जमके नैन दुखियारे,
रुकने का नाम नहीं अब भी पड़ें फुहार..(वीरेंद्र)/2-417


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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