Tuesday, 19 April 2016

2-416 बिना हुनर, बिना फेक्ट्री,

बिना हुनर, बिना फेक्ट्री, बिना उद्योग के अरबों बना रहे हैं,
ये गरीबों के रहनुमा जाने कौन सी तकनीक अपना रहे हैं,
दिन दूनी रात चौगुनी धन-संपत्ति बढ़ती जा रही है इनकी,
फिरभी गरीब से ज़्यादा ये पूछते हैं अच्छे दिन कब आ रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-416

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment