Tuesday, 19 April 2016

2-412 सियासतदानों थोड़ी आंच

सियासतदानों थोड़ी आंच आने दो कभी अपने महलों पर,
कब तक कुर्बान होते रहेंगे शहर तुम्हारे अपने मसलों पर..(वीरेंद्र)/2-412


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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