Sunday, 3 April 2016

2-403 चाँद-सूरज, आसमां में अच्छे

चाँद-सूरज, आसमाँ में अच्छे लगते हैं,
इन्सान मगर ज़मीं पर अच्छे लगते हैं,
ज़िन्दगी की हकीकतें हैं कुछ और ही,
किताबी बोल किताबों में अच्छे लगते हैं..(वीरेंद्र)/2-403


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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