Saturday, 2 April 2016

2-402 वतन की राह में

वतन की राह में फैला रहे अँधेरे,
ज़हर हैं बरसा रहे गद्दार ये चेहरे,
वजूद ही क्यूँ न मिटा दूं मैं इनका,
कभी सगे न होंगे ये देश के मेरे..(वीरेंद्र)/2-402

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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