Monday, 25 April 2016

1-785 पता न थी कीमत

पता न थी कीमत तेरी मुहब्बत की,
आज बिकी जब बाज़ार में तो जानी..(वीरेंद्र)/1-785

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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