Saturday, 9 April 2016

1-779 उजालों की बैरी शाम,

उजालों की बैरी शाम, सूरज को डुबाकर आ जाती है,
रंजिश निभाने के वास्ते, मुझे तन्हा पाकर आ जाती है..(वीरेंद्र)/1-779

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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