Saturday, 2 April 2016

1-770 छलनी हो चुकी है ज़िन्दगी

छलनी हो चुकी है ज़िन्दगी रफू करते-करते,
हकीकत इसकी, अब और छुपाई नहीं जाती..(वीरेंद्र)/1-770 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment