Saturday, 2 April 2016

1-769 वो मेरी ग़लतफ़हमी ही

वो मेरी ग़लतफ़हमी ही सही, मगर बहुत हसीन थी,
तकलीफदेह हकीकतों से तो खुशफहमियों ही अच्छी..(वीरेंद्र)/1-769


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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