Wednesday, 27 April 2016

0-553 हर सिम्त लगे हैं खुशियों

हर सिम्त लगे हैं खुशियों के मेले,
पर कुछ लोग इनमे शामिल नहीं हैं,
कोसते हैं वो ज़माने को इस तराह,
जैसे वो खुद  इसमें शामिल नहीं हैं..(वीरेंद्र)/0-553

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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