Wednesday, 27 April 2016

0-553 हर सिम्त लगे हैं खुशियों

हर सिम्त लगे हैं खुशियों के मेले,
पर कुछ लोग इनमे शामिल नहीं हैं,
कोसते हैं वो ज़माने को इस तराह,
जैसे वो खुद  इसमें शामिल नहीं हैं..(वीरेंद्र)/0-553

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-417 दिल के अन्दर है गुबार

दिल के अंदर है ग़ुबार, बाहर है बहार,
हम जीतके हारे, वो हारकर पहने हार,
बरसों-बरस बरसे जमके नैन दुखियारे,
रुकने का नाम नहीं अब भी पड़ें फुहार..(वीरेंद्र)/2-417


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 25 April 2016

1-785 पता न थी कीमत

पता न थी कीमत तेरी मुहब्बत की,
आज बिकी जब बाज़ार में तो जानी..(वीरेंद्र)/1-785

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 21 April 2016

0-552 ज़ुबान की हिफाज़त करता

ज़ुबान की हिफाज़त करता हूँ, कहीं फिसल न जाय,
दिल काबू में रखता हूँ, हाथ से कहीं निकल न जाय,
खुदा की बक्षी हुई बड़ी नेमत है ये ज़िन्दगी "वीरेंद्र",
डरता हूँ मकसद खाक में इसका कहीं मिल न जाय..(वीरेंद्र)/0-552


रचना: वीरेंद्र सिन्हा"अजनबी"

1-783 तजुर्बेकार और पुरकैफ

तजुर्बेकार और पुरकैफ़ हो जाती है ज़िन्दगी,
जब ठोकरों से असल तालीम पाती है ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/1-783


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-413 देशद्रोही गद्दारों का होंसला

देशद्रोही गद्दारों का होंसला आजकल बेतहाशा बढ़ गया है,
उनकी किस्मत अच्छी है जो हम लोगों का खून जम गया है.(वीरेंद्र)/2-413


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

Tuesday, 19 April 2016

2-419 सुधर जाती है हर भूल

सुधर जाती है हर भूल,
निकल जाते हैं सब शूल,
आचरण करो निष्पाप,
चढ़ाओ ईष्टदेव पर फूल.
ईश्वर बड़ा अन्तर्यामी है,
दृष्टि उसकी दूरगामी है,
छल न सकोगे उसको,
वो तो त्रिलोक स्वामी है.
मानवता ही पूजा है,
दान पुण्य ही पूजा है,
करो असहाय की सेवा,
इस जैसा धर्म न दूजा है..(वीरेंद्र)/2-419

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-416 बिना हुनर, बिना फेक्ट्री,

बिना हुनर, बिना फेक्ट्री, बिना उद्योग के अरबों बना रहे हैं,
ये गरीबों के रहनुमा जाने कौन सी तकनीक अपना रहे हैं,
दिन दूनी रात चौगुनी धन-संपत्ति बढ़ती जा रही है इनकी,
फिरभी गरीब से ज़्यादा ये पूछते हैं अच्छे दिन कब आ रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-416

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-412 सियासतदानों थोड़ी आंच

सियासतदानों थोड़ी आंच आने दो कभी अपने महलों पर,
कब तक कुर्बान होते रहेंगे शहर तुम्हारे अपने मसलों पर..(वीरेंद्र)/2-412


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-415 आओ गरीबों, मिल कर

आओ गरीबों, मिल कर काम करें,
अपने मसीहा का महल तैयार करें,
भुखमरी हो जायगी दूर किसी दिन,
आओ पहले मसीहा का गुणगान करें..(वीरेंद्र)/2-415


रचना: वीरेन्द सिन्हा "अजनबी

2-414 तू तो तेज़-तेज़ चलती जा

तू तो तेज़-तेज़ चलती जा रही है,
मुझसे आगे निकलती जा रही है,
तू मेरी है, मेरा साथ दे ऐ ज़िंदगी,
क्यों हाथ से फिसलती जा रही है..(वीरेंद्र)/2-414


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-551 ज़ालिम है दुनियां, तो "वक्त"

ज़ालिम है दुनियां, तो "वक्त" भी कुछ कम नहीं,
आकर छीन लेता है मेरी खुशियाँ, पर गम नहीं,

ज़रा सब्र से काम लिया कर, ये कहकर मुझसे,
हर बार ही दे जाता है ज़ख्म, कोई मरहम नहीं..(वीरेंद्र)/0551


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-94 अधूरी रह जाएं गर कुछ

अधूरी रह जाएं गर कुछ हसरतें तो जीने का सबब होती हैं,
इन्तजारे-यार में मिल जाएं चंद और साँसें तो बहुत होती हैं.


हर कली की चाहत है खिलखिला कर चहकना और महकना,
मुनास्सिर है मगर इस पर कि चमन में बहारें कब होती हैं.


तमाम उम्र इंतज़ार कर लेना तो फिर भी मुमकिन है "वीरेंद्र",
वक्त-ऐ-आखिरी की घड़ियाँ मगर आमद-ऐ-ज़ुल्मत होती हैं..(वीरेंद्र)/3-94



रचना: .वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-411 सब होता योग्यता के आधार

सब होता योग्यता-आधारित, तो निकम्मे कहाँ जाते,
न होता वोट बैंक अगर, तो नेता अनपढ़े कहाँ जाते..(वीरेंद्र)/2-411


रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

Sunday, 17 April 2016

2-410 दिल-परिवर्तन किसी काम

दिल-परिवर्तन किसी काम न आया,
आ बेवफा हम भी कर लें "घर-वापसी"..(वीरेंद्र)/2-410


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-409 धरती क्यूं माने बादल का

धरती क्यूँ माने बादल का एहसान उसकी प्यास बुझाने का,
बादल का तो पुराना शग़ल है बिन मांगे पानी बरसाने का..(वीरेंद्र)/2-409


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-782 भरी जवानी में ये ग़मों का

भरी जवानी में ये ग़मों का तूफ़ान, ये सैलाबे-अश्क आया कहाँ से,
मैंने लफ़्ज़े-मुहब्बत सुना भी नहीं,फिर जुनूने-इश्क आया कहाँ से..(वीरेंद्र)/1-782


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 13 April 2016

0-550 काश, ऐसी हसीं किस्मत

काश, ऐसी हसीं किस्मत हमारी होती,
तेरी जैसी रात हमने भी गुज़ारी होती।
यूं ना भटकते फिरते इस कदर तन्हा,
पुरसुकूं आशना ज़िन्दगी हमारी होती..(वीरेन्द्र)/0-550


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 12 April 2016

1-781 तेरी वफ़ा को कैसे

तेरी वफ़ा को कैसे हासिल मैं कर लेता,
बेवफा वक्त को भी तो मैं रोक नहीं पाया..(वीरेंद्र)/1-781


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 11 April 2016

2-405 लात, घूँसा, चप्पल, जूता

लात, घूँसा,चप्पल, जूता आज के सम्मान,
जो जितने खाये, बस वही नेता बने महान,
मीडिया में अच्छों का कोई नाम-लेवा नहीें,
धूर्त कौओं को टीवी पर रोज़ मिले स्थान..(वीरेंद्र)/2-405


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-780 चाहतों का खूँ किया जाय

चाहतों का ख़ूँ किया जाय ज़रूरी तो नहीं,
हर कोई चाहत हो नापाक, ज़रूरी तो नहीं..(वीरेंद्र)/1-780


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 9 April 2016

1-779 उजालों की बैरी शाम,

उजालों की बैरी शाम, सूरज को डुबाकर आ जाती है,
रंजिश निभाने के वास्ते, मुझे तन्हा पाकर आ जाती है..(वीरेंद्र)/1-779

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-778 वफ़ा-जफ़ा की बातें मत कर

वफ़ा-जफ़ा की बातें मत कर, रिश्ते निभाता जा,
रफ़ा-दफ़ा कर गिले शिकवे, मुहब्बतें बढ़ाता जा..(वीरेंद्र)/1-778


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-777 मै वाकिफ हूँ ज़माने के

मैं वाकिफ हूँ ज़माने के बदलते हुए मिज़ाज़ से,
मुझे किसी की बेवफाई ने नहीं, तनहाई ने मारा है..(वीरेंद्र)/1-777


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-775 दौरे-जदीद में ज़िन्दगी

दौरे-जदीद में ज़िन्दगी जीने का हुनर चाहिए,
अब कहाँ से लाऊं, उसे पाने को भी उमर चाहिए..(वीरेंद्र)/1-775


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-408 मीठा बोलने वालों से भी

मीठा बोलने वालों से भी डरना पड़ता है,
चेहरे के पीछे छिपा चेहरा ढूंढना पड़ता है..(वीरेंद्र)/2-408


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 6 April 2016

2-407 रंगों की मुझे पहचान


रंगों की मुझे पहचान नहीं, बस एक ही रंग भाये,
जिसपर चढ़ा हो रंग मेरा, बस मुझे वही रंग भाये..(वीरेंद्र)/2-407


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-776 तमाम उम्र को सकूं

तमाम उम्र का सकूं गया,
वक्ती ख़ुशी पे मै क्यूं गया...(वीरेंद्र)/1-776


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-774 बड़े गज़ब के हुनरमंद

बड़े गज़ब के हुनरमंद हैं ज़माने में लोग,
अपनों को भी अजनबी बना देते हैं लोग..(वीरेंद्र)/1-774


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 5 April 2016

1-773 वैसे तो मै पत्थर हूँ,

वैसे तो मै पत्थर हूँ, मगर अक्सर पिंघल जाता हूँ मै,
ज़रा ध्यान रखना, आतिशे-हुस्न से जल जाता हूँ मै..(वीरेंद्र)/1-773


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-404 शहर हैं जहाँ, वहां जंगल

शहर हैं जहाँ, वहां जंगल हुआ करते थे,
टावर हैं जहाँ, वहां शजर हुआ करते थे,
सूख रहे अब नदी,नाले,झरने धीरे-धीरे,
सूखा है,जहाँ सब्ज़ मंज़र हुआ करते थे..(वीरेंद्र)/2-404


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 3 April 2016

1-772 भूलने वाले को मै बेवफा

भूलने वाले को मै बेवफा कैसे कह दूं,
भुलक्कड़ भी तो मुहब्बत किया करते हैं..(वीरेंद्र)/1-772


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-403 चाँद-सूरज, आसमां में अच्छे

चाँद-सूरज, आसमाँ में अच्छे लगते हैं,
इन्सान मगर ज़मीं पर अच्छे लगते हैं,
ज़िन्दगी की हकीकतें हैं कुछ और ही,
किताबी बोल किताबों में अच्छे लगते हैं..(वीरेंद्र)/2-403


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 2 April 2016

0-549 मेरे मालिक तू चाहे तो

मेरे मालिक तू चाहे तो आँखें नम देदे,
किसी की ख़ुशी के लिए मुझे गम देदे,
बस इतनी सी इल्तिजा है तुझसे मेरी,
तन्हाई न देना चाहे जितने सितम देदे..(वीरेंद्र)/0-549


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-771 कहते हैं, ज़िन्दगी तू नहीं

कहते हैं, ज़िन्दगी तू नहीं मिलती दोबारा,
फिर मौत इंसा को क्यों बार-बार मिल जाती है..(वीरेंद्र)/1-771


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-770 छलनी हो चुकी है ज़िन्दगी

छलनी हो चुकी है ज़िन्दगी रफू करते-करते,
हकीकत इसकी, अब और छुपाई नहीं जाती..(वीरेंद्र)/1-770 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-769 वो मेरी ग़लतफ़हमी ही

वो मेरी ग़लतफ़हमी ही सही, मगर बहुत हसीन थी,
तकलीफदेह हकीकतों से तो खुशफहमियों ही अच्छी..(वीरेंद्र)/1-769


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-768 दम तो बहुत है तेरे

दम तो बहुत है तेरे समझाने-बुझाने में,
पर इतनी भी सीख न दे, बदले हुए ज़माने में,.(वीरेंद्र)/1-768


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-548 आँखों में आंसू कभी

आँखों में आंसू कभी न आया करते,
हसीन लम्हे अगर रुक जाया करते,
तन्हाई, जुदाई, इम्तिहाँ हैं इश्क के,
लोग किसी को कैसे आजमाया करते..(वीरेंद्र)/0-548


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-406 मै रोज़ यहाँ आ कर

मै रोज़ यहाँ आ कर  बैठ जाता हूँ,
वो कह कर गया था मै अभी आता हूँ..(वीरेंद्र)/2-406


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-767अपनों के लिए उससे

अपनों के लिए उससे फरियाद कर लेता हूँ
मैं खुदा का बंदा दुश्मनों को भी याद कर लेता हूँ..(वीरेंद्र)/1-767


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-402 वतन की राह में

वतन की राह में फैला रहे अँधेरे,
ज़हर हैं बरसा रहे गद्दार ये चेहरे,
वजूद ही क्यूँ न मिटा दूं मैं इनका,
कभी सगे न होंगे ये देश के मेरे..(वीरेंद्र)/2-402

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"