Friday, 18 March 2016

3-93 दर्द बेचारा फिर मिलने

दर्द बेचारा फिर मिलने चला आया शर्मिंदा हो कर,
चंद रोज़ पहले चला गया था वो मुझसे बेवफा हो कर,

इतने बरसों का रिश्ता दर्द से, मै कैसे भुला देता,
मैंने भी फिरसे गले लगा लिया उसे आबदीदा हो कर,

लौटादीं मैंने खुशियाँ जो पाईं थी उसकी गैरहाजरी में,
महफूज़ रखे बैठा था जबसे वो गया गुमशुदा हो कर,

दर्द अज़ीज़ होते हैं, ज़माने की ये तस्वीर होते हैं,
दुनियां बेहतर समझ में आई मुझे ग़मज़दा हो कर,

टिकतीं नहीं मेरी खुशियाँ, ये तो बड़ी नापायेदार हैं,
दर्द भी बेचारे रहते नहीं तन्हा, मुझसे अलेहदा हो कर.(वीरेंद्र)/3-93.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment