Thursday, 17 March 2016

3-92 मर रही है इंसानियत

मर रही है इंसानियत, परेशान हूँ मैं भी,
मैं भी गुनेहगार, क्योंकि इंसान हूँ मैं भी,


हर सिम्त कत्लो-गारत है मचा अब तो,
किसको बचाऊँ मैं, लहूलुहान हूँ मैं भी,



बड़े बेख़ौफ़ घूम रहे हैं मुल्क के गद्दार,
खामोश हैं रहनुमा, बेज़ुबान हूँ मैं भी,

कैसे जी रहे सरहदों पर जांबाज़ हमारे,
इल्मियों को इल्म नहीं अंजान हूँ मैं भी,

तस्वीरे-मुल्क कभी न बिगड़ने पाए अब,
ये मिट्टी बदनाम हुई तो बदनाम हूँ मैं भी,

आओ हम मिलकर लड़ें दहशतगर्दों से,
आप बनो निगेहबाँ, पासबान हूँ मैं भी..(वीरेंद्र)/3-92

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

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