Tuesday, 29 March 2016

2-400 वो क़त्ल, क़त्ल नहीं

वो क़त्ल, क़त्ल नहीं, ख़ुदकुशी, ख़ुदकुशी नहीं,
गर वो किसी विशेष-धर्म या समुदाय की नहीं,
लाशों पर भी मज़हब की सियासत करने वालों,
क्या बाकी इंसानों की ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नहीं..(वीरेंद्र)/2-400


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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