Saturday, 12 March 2016

2-395 मुझको लगती है ये दुनिया

मुझको लगती है ये दुनिया अच्छी,
विदेशों में भी हैं, कुछ बात अच्छी,
किन्तु जैसी भी है भारत मेरी माँ है,
शेष मिथ्या है, उसकी प्रीत सच्ची,
अंतिम क्षण तक उसकी वंदना करूँ,
मस्तक धारण करूँ उसकी मिटटी,
हर शत्रु-प्रहार अपने पर ले लूँगा मै,
गद्दार देशद्रोहियों के सर ले लूँगा मै,
कुदृष्टि जिसकी भी मेरी माँ पर उट्ठी..(वीरेंद्र)/2-395


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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