Saturday, 12 March 2016

2-382 मुसाफिर हूँ यारों

मुसाफिर हूँ यारों, ना पूछो कहाँ से कहाँ तक,
हर पड़ाव ही मेरी मंज़िल है यहाँ से वहां तक,
घुमावदार रास्ते हैं कहीं ऊंचे-नीचे कहीं गहरे,
बढ़ते चले जाना है मुझे सकून मिले जहां तक...(वीरेंद्र)/2-382


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment