Tuesday, 29 March 2016

1-765 काश, वक्त के भी दामन होता

काश, वक्त के भी दामन होता, जाने न देता मैं उसको,
जाता भी अगर, तो दामन पकड़ खींच लेता मैं उसको..(वीरेंद्र)/1-765


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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