Saturday, 12 March 2016

1-755 बेदर्द दुनियां को लात

बेदर्द दुनियाँ को लात मार, गूंगे बहरे बनकर निकल पड़े हम, 
वो चीखती चिल्लाती रही, हमने सोच लिया 'ये तो दुनिया है'..(वीरेंद्र)/1-755


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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