Saturday, 12 March 2016

1-754 अब सँभालने जा रही

अब सँभलने जा रही है ज़िन्दगी,
जब लबे-दम आ रही है ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/1-754

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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