Monday, 14 March 2016

0-547 ज़िन्दगी ख्वाब नए

ज़िंदगी ख्वाब नए दिखाने लगी है,
दामन हकीकतों से छुड़ाने लगी है,
इसे जाने कौन से भरोसे हो गए हैं,
गीत रोज़ नए नए गुनगुनाने लगी है..(वीरेंद्र)/0-547


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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