Thursday, 31 March 2016

2-401 चूहा जुलाहा बना

चूहा जुलाहा बना, उसके हाथ कत्तर लग गई,
अँधा शिकारी बना, उसके हाथ बटेर लग गई,
कुत्ते की पूँछ १२ साल में भी सीधी नहीं होती,
दिल्ली की जनता को ये मानने में देर लग गई..(वीरेंद्र)/2-401
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 29 March 2016

1-766 बंद कर दिया मैखाना

बंद कर दिया मैख़ाना, जाम अभी बाकी है,
तिश्नगी से मेरी, बहुत अंजान मेरा साकी है..(वीरेंद्र)/1-766

रचना: वीरेंद्र सिन्हा अजनबी"

2-400 वो क़त्ल, क़त्ल नहीं

वो क़त्ल, क़त्ल नहीं, ख़ुदकुशी, ख़ुदकुशी नहीं,
गर वो किसी विशेष-धर्म या समुदाय की नहीं,
लाशों पर भी मज़हब की सियासत करने वालों,
क्या बाकी इंसानों की ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नहीं..(वीरेंद्र)/2-400


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-765 काश, वक्त के भी दामन होता

काश, वक्त के भी दामन होता, जाने न देता मैं उसको,
जाता भी अगर, तो दामन पकड़ खींच लेता मैं उसको..(वीरेंद्र)/1-765


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 27 March 2016

1-764 बेइंतहा मुहब्बत है मुझे

बेइंतहा मुहब्बत है मुझे उससे, मैं उसे खोना नहीं चाहता,
है अगर वो बेवफा, तो हो, मैं उसे आज़माना नहीं चाहता..(वीरेंद्र)/1-764


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 26 March 2016

1-763 मेरे सामने से गुज़र गया

मेरे सामने से गुज़र गया बनकर अंजाना सा वो,,
मैंने न दी आवाज़, फिरभी क्यों लगा रुका सा वो..(वीरेंद्र)/1-762


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

1-762 तुझ ही से क्यों शिकवा

तुझ ही से क्यों शिकवा किया जाय तेरे बदल जाने का,
मौसम से भी भला कभी कोई शिकवा किया करता है.(वीरेंद्र)/1-762


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

2-399 ऐसा मंदिर नहीं देखा

.
ऐसा मंदिर नहीं देखा, कोई मस्जिद ऐसी नहीं देखी,
कोई घर ऐसा नहीं देखा, कोई नगरी ऐसी नहीं देखी,
मै तलाशता ही रहा मज़हबी भाईचारा जगह-जगह,
मगर धर्म-निरपेक्षता कहीं मयखाने जैसी नहीं देखी..(वीरेंद्र)/2-399


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 25 March 2016

1-761 मुहब्बतों से नज़र मोड़ी नहीं

मुहब्बतों से नज़र मोड़ी नहीं जाती,
बेवफाई के डर से वफ़ा छोड़ी नहीं जाती..(वीरेंद्र)/1-761


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-398 एक गद्दार मांगता है आजादी

एक गद्दार मांगता है आज़ादी उससे, जिसने उसे पैदा किया है,
मांगता है बर्बादी उसकी जिसने उसे पाल-पोस के बड़ा किया है,
वो कमज़र्फ अपना हमदर्द समझता है बस उन सियासतदां को,
मादरे-वतन को जिन्होंने अक्सर दुश्मनों के हाथों बेचा किया है..(वीरेंद्र)/2-398


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-392 चली है कुछ ऐसी हवा

चली है कुछ ऐसी हवा, लगता है मैं अपने वतन में नहीं हूँ,
है कोई रहनुमा, जो मुझे एहसास दिला दे मैं वतन में ही हूँ..(वीरेंद्र)/2-392


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-760 लगा कर हलकी सी चिंगारी

लगा कर हलकी सी चिंगारी यूं न चला जा,
भड़कने को आग ज़रा हवा भी तो देता जा..(वीरेंद्र)/1-760


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-391फिर बंट गया अगर देश

फिर बंट गया गर देश मेरा तो, बोलो किसकी जवाबदारी है,
हाकिमों फ़ौरन बुझा दो, अभी तो ये महज़ एक चिनगारी है..(वीरेंद्र)/2-391


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-390 किसने सोचा था आज़ाद

किसने सोचा था आज़ाद भारत में फिरसे गद्दारी की आवाज़ें उठेंगी,
खुदगर्जी छोड़ उठा लो तलवारें, नहीं तो मुल्क में फिर दीवारें उठेंगी..(वीरेंद्र)/2-390


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-397 मेरे पूर्वजों ने

मेरे पूर्वजों ने खाया पीठ में छुरा गद्दारों से,
मगर मैं तो नहीं खाऊंगा धोखा गद्दारों से,
बहुत निभाया है इंसानियत का भाईचारा,
अब ना रक्खूँगा मै, कोई रिश्ता गद्दारों से..(वीरेंद्र)/2-397


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-396 आज का पढ़ा-लिखा

आज का पढ़ा-लिखा समझदार आदमी,
फिर भी मुल्क से कितना गद्दार आदमी,
आज़ाद देश का आज़ाद बाशिंदा हो कर,
किस आज़ादी की करता दरकार आदमी..(वीरेंद्र)/2-396


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 19 March 2016

2-383 आपमें है लियाकत तो

आपमें है लियाकत तो काम कीजिये,
वर्ना तो सियासत में सलाम कीजिये,
कर नहीं सकते अगर खुद को बुलंद,
तो दूसरों को बेशक बदनाम कीजिये..(वीरेंद्र)/2-383


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 18 March 2016

2-389 बेहतर है मीठा रहना,

बेहतर है मीठा रहना छोटा सा दरिया बन कर,
बनिस्बत, खारा हो जाना बड़ा समंदर बन कर..(वीरेंद्र)/2-389


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-93 दर्द बेचारा फिर मिलने

दर्द बेचारा फिर मिलने चला आया शर्मिंदा हो कर,
चंद रोज़ पहले चला गया था वो मुझसे बेवफा हो कर,

इतने बरसों का रिश्ता दर्द से, मै कैसे भुला देता,
मैंने भी फिरसे गले लगा लिया उसे आबदीदा हो कर,

लौटादीं मैंने खुशियाँ जो पाईं थी उसकी गैरहाजरी में,
महफूज़ रखे बैठा था जबसे वो गया गुमशुदा हो कर,

दर्द अज़ीज़ होते हैं, ज़माने की ये तस्वीर होते हैं,
दुनियां बेहतर समझ में आई मुझे ग़मज़दा हो कर,

टिकतीं नहीं मेरी खुशियाँ, ये तो बड़ी नापायेदार हैं,
दर्द भी बेचारे रहते नहीं तन्हा, मुझसे अलेहदा हो कर.(वीरेंद्र)/3-93.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 17 March 2016

1-759 तेरे आने से

तेरे आने से मेरे ग़म, होंगे कम नहीं,
बस एक तन्हाई ही तो मेरा ग़म नहीं..(वीरेंद्र)/1-759


रचना: वीरेंद्र सिन्हा 'अजनबी"

2-388 हमवतन भी काबिल-ऐ-दोस्ती

हमवतन भी काबिल-ऐ-दोस्ती नहीं,
गर उसमे जज़्बा-ऐ-वतनपरस्ती नहीं./2-388


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-92 मर रही है इंसानियत

मर रही है इंसानियत, परेशान हूँ मैं भी,
मैं भी गुनेहगार, क्योंकि इंसान हूँ मैं भी,


हर सिम्त कत्लो-गारत है मचा अब तो,
किसको बचाऊँ मैं, लहूलुहान हूँ मैं भी,



बड़े बेख़ौफ़ घूम रहे हैं मुल्क के गद्दार,
खामोश हैं रहनुमा, बेज़ुबान हूँ मैं भी,

कैसे जी रहे सरहदों पर जांबाज़ हमारे,
इल्मियों को इल्म नहीं अंजान हूँ मैं भी,

तस्वीरे-मुल्क कभी न बिगड़ने पाए अब,
ये मिट्टी बदनाम हुई तो बदनाम हूँ मैं भी,

आओ हम मिलकर लड़ें दहशतगर्दों से,
आप बनो निगेहबाँ, पासबान हूँ मैं भी..(वीरेंद्र)/3-92

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

Monday, 14 March 2016

1-757 तू तो बन गया मेहरबां

तू तो बन गया मेहरबाँ, देके उधार की ज़िन्दगी,
पर मुझे बता क्या करूँ मै लेके ख़ार की ज़िन्दगी.(वीरेंद्र)/1-757.


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

0-547 ज़िन्दगी ख्वाब नए

ज़िंदगी ख्वाब नए दिखाने लगी है,
दामन हकीकतों से छुड़ाने लगी है,
इसे जाने कौन से भरोसे हो गए हैं,
गीत रोज़ नए नए गुनगुनाने लगी है..(वीरेंद्र)/0-547


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 12 March 2016

2-395 मुझको लगती है ये दुनिया

मुझको लगती है ये दुनिया अच्छी,
विदेशों में भी हैं, कुछ बात अच्छी,
किन्तु जैसी भी है भारत मेरी माँ है,
शेष मिथ्या है, उसकी प्रीत सच्ची,
अंतिम क्षण तक उसकी वंदना करूँ,
मस्तक धारण करूँ उसकी मिटटी,
हर शत्रु-प्रहार अपने पर ले लूँगा मै,
गद्दार देशद्रोहियों के सर ले लूँगा मै,
कुदृष्टि जिसकी भी मेरी माँ पर उट्ठी..(वीरेंद्र)/2-395


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-394 भारत माँ हम तुझसे

ऐ भारत माता हम तुझ से शर्मिंदा हैं,
कि तुझ पर वार करने वाले जिंदा हैं,
सहिष्णुता की बातें  अब नहीं करेंगे,
तेरे और टुकड़े बर्दाश्त अब नहीं करेंगे. 
दे देंगे हम उनको जीवन से आजादी,
जो मांग रहे थे हमारी माँ की बर्बादी,
ऐ माँ अब तू भी हमें नहीं रोक सकेगी,,
अब गिद्धों के विरुद्ध जंग हो कर रहेगी
हम भी देखें कौन किस घर से पैदा होगा,
हर घर पे माँ तेरा भगत सिंह बैठा होगा,
हम तुझसे शर्मिंदा थे,अब और न होंगे,
माँ तेरे अपराधी पैदा,  अब और न होंगे..(वीरेंद्र)/2-394

रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-382 मुसाफिर हूँ यारों

मुसाफिर हूँ यारों, ना पूछो कहाँ से कहाँ तक,
हर पड़ाव ही मेरी मंज़िल है यहाँ से वहां तक,
घुमावदार रास्ते हैं कहीं ऊंचे-नीचे कहीं गहरे,
बढ़ते चले जाना है मुझे सकून मिले जहां तक...(वीरेंद्र)/2-382


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-756 छोटी बात छोटी नहीं

छोटी बात छोटी नहीं होती, बड़ी मानी जाती है,
छोटी बात से ही तो, औकात पहचानी जाती है..(वीरेंद्र)/1-756


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

1-755 बेदर्द दुनियां को लात

बेदर्द दुनियाँ को लात मार, गूंगे बहरे बनकर निकल पड़े हम, 
वो चीखती चिल्लाती रही, हमने सोच लिया 'ये तो दुनिया है'..(वीरेंद्र)/1-755


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-754 अब सँभालने जा रही

अब सँभलने जा रही है ज़िन्दगी,
जब लबे-दम आ रही है ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/1-754

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-387 किसी की गरीबी दूर

किसी की गरीबी दूर करनी है तो उसे गरीबों का नेता बना दो,
वो हक की लड़ाई लडेगा, गरीबों का हक़ तुम उसका हक़ बना दो..(वीरेंद्र)/2-387

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-386 सब कोई कहाँ

सब कोई कहाँ ज़ुल्मो-सितम सह पाते हैं,
चराग भी होके रौशन तूफां में बुझ जाते हैं..(वीरेंद्र)/2-386

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-385 तू पत्थर थी,

तू पत्थर थी, मै भी तेरा उत्तर हो गया हूँ,
तेरी तरह जमकर मै भी पत्थर हो गया हूँ..(वीरेंद्र)/2-385

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-381 माना अधिक ज्वलंत है

माना अधिक ज्वलंत है तेरी तृष्णा,
पर इतनी अधीर न हो, नव-यौवना,
धरती की प्यास न बुझी, न बुझेगी,
बेचारा सावंत बरस ले चाहे जितना..(वीरेंद्र)/2-381

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


2-393 हम बस वीर रस की कविता

हम बस वीर रस की कविता करते जाएंगे,
और ये गद्दार देश को गर्त में डुबाते जाएंगे,
वाद-विवाद विचार-विमर्श में पड़े रहेंगे हम,
वे नारों को अपने अमली जामा पहनाते जाएंगे",
चिंगारी लगा ये लोग जश्न मनाते जाएंगे,
कुछ नेता आग में और घी डालते जाएंगे,
गद्दार बदलके रख देंगे इतिहास मुल्क का,
भावी पीढ़ी कोे कौनसा नया इतिहास ये पढ़ाएंगे.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 7 March 2016

1-758मेरा दिल मेरे जज़्बात

मेरा दिल मेरे जज़्बात चोट खाये हो गए,
दोनों थे मेरे, पर आज वो पराये हो गए..(वीरेंद्र)/1-758


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-753 तुम्हारी तरह अब तलक

तुम्हारी तरह अब तलक मैंने भी तुम्हे भुला दिया होता
गर भुला देने का हुनर तुमने मुझे भी सिखा दिया होता..(वीरेंद्र)/1-753


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 2 March 2016

1-752 जितनी तेरी रजा हो

जितनी तेरी रज़ा हो ऐ मेरे खुदा, मुझे अलम दे दे,
साथ में मगर तकदीर लिखने वाली मुझे कलम दे दे..(वीरेंद्र)/1-752


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-380 किताबों को पढने से

किताबों को पढ़ने से विस्तारित ज्ञान आता है,
जीवन के संघर्ष से व्यवहारिक ज्ञान आता है,
विस्तारित व् व्यवहारिक में चार चाँद लगते हैं,
जब संतों में बैठके आध्यात्मिक ज्ञान आता है..(वीरेंद्र)/2-380


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"