Tuesday, 9 February 2016

0-542 तुम्हारी "ज़मीं" तुम्हारा "आसमां"

••निदा फ़ाज़ली साहब के इंतकाल पर••
तुम्हारी "ज़मीं" तुम्हारा "आसमाँ" यहाँ पड़ा है,
तुम्हारा  दिलकश अदबी कहकशां यहाँ पड़ा है,
तुम तो तलाशे-"मुकम्मल जहाँ" में निकल पड़े,
तुम्हारा हर चाहने वाला तिशनगा यहाँ पड़ा है..(वीरेंद्र)/0-542

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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