Saturday, 6 February 2016

3-90 वीरान कर जाते हैं घोंसले

वीरान कर जाते हैं घोंसले को,
ज़रा से परिंदे सयाने क्या हुए।
रहते थे कभी सब साथ हम,
कौन जाने वो ज़माने क्या हुए।
पाने लगते हैं हम नए ज़ख्म,
ज़रा से ज़ख्म पुराने क्या हुए।
ढा रहे सितम सिर्फ अपने ही,
शहर के तमाम बेगाने क्या हुए।
नहीं भूल पा रहा मैं दर्द अपने,
इन गलियों के मैखाने क्या हुए।
ग़मज़दाओं की यहीं थी आमद,
उनके अब वो ठिकाने क्या हुए।
सूरज-चाँद वही,आसमान वही,
पर वो लम्हे वो नज़ारे क्या हुए।
दिलों को जाने के रास्ते है गायब,
रूहानी से वो गलियारे क्या हुए।..(वीरेंद्र)/3-90

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

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