Saturday, 27 February 2016

2-379 हम वो नहीं जो इन्तेकाल

हम वो नहीं जो इंतेक़ाल पर मुंह ज़मीन में छुपा लेते हैं,
हम तो वो हैं जो मर कर भी आग को गले लगा लेते हैं,
भारत माँ के टुकड़े और बर्बादी की तमन्ना रखने वालों,
हम वतन के बाग़ी गद्दारों को मौत की नींद सुला देते हैं..(वीरेंद्र)/2-379

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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