Friday, 5 February 2016

2-371 ज़हर घुली ज़िन्दगी

ज़हर घुली ज़िंदगी को घूँट-घूँट कर जीना पड़ता है
ग़म को ही खाना और ग़म को ही पीना पड़ता है..(वीरेंद्र)/2-371


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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