Monday, 22 February 2016

2-366 ज़िन्दगी भी उतनी ही

ज़िन्दगी भी उतनी ही अनिश्चित है जितने कि 'अपने'.
और "अपने" भी उतने ही लुभावने हैं जितने कि सपने..(वीरेंद्र)/2-366

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment