Tuesday, 23 February 2016

1-748 जुबां छीन ली, वो क्या

जुबां छीन ली, वो क्या कम है,
जो अब खामोशी भी छीनने लगे हो..(वीरेंद्र)/1-748


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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