Thursday, 11 February 2016

1-744 रूप छुपा कर रखती हूँ

रूप छुपा कर रखती हूँ, न जाने तू कब बहक जाये,
बादल जैसी आदत तेरी, कौन जाने कब बरस जाये..(वीरेंद्र)/1-744


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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