Saturday, 27 February 2016

0-546 मै जानता हूँ, तू मुझे

मैं जानता हूँ, तू मुझे भला कैसे चाह सकता है,
मगर कैसा है तू, कभी यह तो बता सकता है,
ज़रूरी नहीं तू करे ख़तो-खिताबत मुझसे, पर
वक्ते-ज़रुरत मुझको आवाज़ तो लगा सकता है..(वीरेंद्र)/0-546


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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